Innocent love

Monday, August 23, 2021

मेरी डायरी, मेरी किट्टू

मेरी डायरी मेरे किस्से मेरी कहानी मेरे हिस्से खुशी के लम्हे गम के साए समेटे है हर जज्बात को खुद में कुछ शब्दों में बंधी श्याम और सुबह। ये स्याही है गवाह हर जज्बात की हर हालात की हर लम्हात  

मेरी डायरी साल गुजर गई इसमें नया साल भी देखा है चमचमाते वो नए साल के गली और मोहल्ले की तस्वीर भी है और इल्म भी

मकर सक्रांति का चूरमा और जाड़े की रात, खुले आसमान में उड़ती पतंग अपनी डोर के साथ,
लेकर रंगो की बहार होली के स्वागत में तैयार ढेरो गुलाल के रंग और मनोल्लास ,पन्नो में समेट कर डायरी ने रखा अपने पास

सावन आया चादर हरियाली की ओढ़कर जन्नत सा नजारा है, वादिया चहकती है तीज आने की बाट जोहती है
झूलो पर झूलता सावन मुस्कुराहट को देख नवयुवतियों की गदगद हो जाता है , घेवर की मिठास जब जी में घुल घुल जाती है साल भर उसकी याद आती है, 

कच्चे धागे से बनी राखी पक्के रिस्तो की डोर बन जाती है राखी आती है खुद को बया करने फिर सुंदर थाली में सज जाती है , भाई बहन की बरस भर की नटखट आंख मिचौली आज प्यार बन बरस जाती है, भाई वचन रक्षा का देता है बहन वचन खुशियां बटाने का देती है ,कलाई पर एक कच्ची डोर, आसमान में उड़ती पतंग और डोर 
मुश्किल सा है बांध पाना लफ्जो में 

सावन बीता सर्द हवाओं ने रूख अपना लिया देवी के नौ रातों ने भक्ति की परिभाषा समझाई,रामजी ने दशहरे को रावण की लंका जलाई। मेला दशहरे का देखने जब भी जाते गोलगप्पे और चाट के चटकारे जबान पर जरूर आते।
बड़े बुजुर्ग कह गए माया मरी न मन मरा मर मर गए शरीर , आसा तृष्णा न मरी ,कह गए दास कबीर। एक रावण जलाकर आए एक रावण मन में वापस ले आए 

घर की साज सज्जा का खयाल करते करते अपनी डायरी भूल गई तो पूछ लिया उसने ऐसा क्या खास है अरे यार दिलो की दिपावली है ढेर सारे पटाखे है कपड़ो की भरमार है फिर भी कौनसा पहने इसके लिए परेशान है
चमचम करती लडिया घर का श्रृंगार है आंगन की वो रंगो वाली रंगोली और दियो से सजा पूरा घर परिवार है
न्यारी न्यारी मिठाई देख कौनसी पहले खाऊं मन परेशान है
खुशियों को तस्वीर बनाने के लिए भाई का कमरा तैयार है
लक्ष्मी जी की आरती में बैठे बैठे पटाखे चलाने की होड़ है 
आसमान को छूकर कई रंगो में बिखरता रॉकेट का उजाला 
जैसे जिंदगी का भर गया हो खुशियां का प्याला  

गोवर्धन की कहानी और कृष्ण जी की मै दीवानी 
दाल बाटी चूरमा और गोवर्धन महाराज की जय जयकार से गूंजते हुए उस रात का ढल जाना ।
भाई दूज की वो मोली की डोर, लेकर आई अंधियारे से नई भोर 
बीत गया बरस चंद पन्नो पर बिखरी स्याही में सिमट गए सब अल्फाजों के ताल मेल में 
गुजर जाते है जो किस्से बन जाते कुछ कहानी बन जाते हैं किस्से और कहानी जिंदगी के हिस्से बन जाते है 
आज याद आई कुछ भूले बिसरे किस्सों की कुछ लफ्जो में लिपटे हिस्सो की तो डायरी ने सब दिखा दिया फिर बीते हुए वक्त को याद कर कभी मुस्कुराहट तो कभी आंखों को नम बना दिया 
       मेरी डायरी मेरी किट्टू

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