Innocent love

Monday, May 17, 2021

जिंदगी

चल रही है चलने दो कहावत का नाम है जिंदगी अनसुलझे अनजाने जज्बातों में उलझी सी है जिंदगी

नदियों सी बहती है कभी झील सी ठहरी है कभी सीधी कभी टेडी सी है जिंदगी

उलझकर रह जाता कोई इस जिंदगी नाम की किताब में कोई सुलझाकर इसे ही उलझा दे पन्ने होते है कुछ ऐसे जो खुद ये भी ना समझ पाए पर दूसरो को देखो कैसे उलझाए

समझ न आए जब खेल जिंदगी का तो जहमत ना उठाए मांझी में अपने झाक कर देख लेना कुछ गलत था ये खुद समझ आ जायेगा

उलझी हुई डोर को सुलझाने में मशगूल हुए बैठकर ना जाने कब जिंदगी इतनी मशगूल हो गई की अब बेवफा हो गई ना हम जानते ये क्या चाहती है और वो जानती की हम क्या चाहते है 

सीख गए है हाल दिल का लिखना बस लिख देते है जानने को दिल बेताब है ये बस किस्से है या बस कुछ वक्त के लिए की गई दिल्लगी  

 पहले कहानी जिंदगी की हम बैठकर सुनाया करते थे महफिलों में अब जिंदगी कहानी सुनाती है और हम बस श्रोता बन रह गए 
 
 रूठकर बैठना हमने कभी सीखा ही नही तूने ना जाने किस बेगरत की पनाह में ये सिख लिया साथ चलते थे हम तो फिर क्यों अब यू मुंह मोड़ लिया
 
 नए चेहरे भी आए अब आंखों के परदे पर लेकिन तेरे दीदार के बिना मायूस है वो हसीन आजकल
 
 बस कुछ लम्हे ही तो खफा रहते थे उन दिनो फिर आज क्यों इतनी नाराजगी है बता भी दे अब 
 
 सांझ को आसमान के नीचे का आलम भी कुछ यू सवाल करता है अब अकेले क्यों हो तुम तू कोई जवाब बता भी दे 
 
 रात को आंखों से खफा नींद आने का नाम नहीं लेती बेहया ना जाने किन नैनों का सुकून बन गई पर खुशी तो है थोड़ी कोई सुकून में तो है
 
 ना बदल तू रास्ते इस कदर मंजिल तो हमारी एक है क्यों रास्तों में खोना इधर उधर पथरीले रास्तों पर हम ही तो तेरे कदमों में हाथ बिछाएंगे
 
 किस बात का गुरुर है ए जिंदगी तुझे हम अपने हौसलों का तीर बनायेगे जो मंजिल है हमारे तुझे वही पहुंचाएंगे  
 
 वक्त का तकाजा होने तक की बात है फिर तुझे अपनी हाथो की सुनहरी लकीरें बनायेगे
 
 
 

Sunday, May 16, 2021

रांझणा

देख ना मेरी आंखों में प्यार बेहद हैं, इन आंखों मे तुझे दिखता भी है क्या प्यार मेरा
बता मेरे रांझणा .......

प्यार में तेरे जी लू या मर जाऊ
बता दे तू ही, तेरी आंखों में बस जाऊ या खुद को बह जाने दू
बता दे मेरे रांझणा...... 

आगोश में तेरे डूब जाऊ या तर जाने दू,
आतिश मोहब्बत है तेरी अफ़सुर्दा हूं अनजान हू अंजाम से 
अश्क बनेगा मेरे या अशफाक बता दे रांझणा ..........

तू आरजू है मेरी इकि्तजा है मेरी इत्माम बन मेरा मैं तुझमें सिमट जाऊ,
आगाज़ है ये अफसाने का या अन्त ज़रा इजाज-सा है;
इश्क है या अगलात बता दें मेरे रांझणा......

आब-ए-आइने में नज़र आते हो तुम इस कदर जैसे झील में आफ़ताब कि पहली किरण,
मोहब्बत का इज़हार करूं या इजि्तरार;
इबादत करु तुम्हे पाने कि या भूल जाऊं बता मेरे रांझणा......

अब तो ये आलम तुझे ही पुकारु मैं सुबह शाम,कोई अल्फाज़ ना हो तेरी खामियों के लिए
बेघर पंक्षी का बन जा तू आशियाना  
मान लूं तुझे अपना ख़ुदा या दुआओ मे छोड़ दूं बता दें मेरे रांझणा......

समेट ले खुद में इस कदर अब्र में पानी की बूंदें हो जैसे ,
तेरी इबि्तसाम हूं मैं या उदासी हूं बता दें मेरे रांझणा........ 
 

Saturday, May 8, 2021

मां

मां तू जानती है क्या, तू कितनी अहम है मेरी जिन्दगी के लिए... जब याद आता है बचपन बस तू ही तो दिखती है...... घर के उस नमकीन खाने के लिए लड़ते हैं भाई बहन में उलझी सी तू रहती हैं ....छोटी छोटी बातों के लिए बेवजह परेशान दिखती है ......तू धूप के हर मंजर में बरगद सी छांव देती हैं ।

Search This Blog

ढूंढू कहां

ढूंढू कहा खुद को खुद में ही बेचैन हूं ना आज का पता न कल का बस ख्वाइशों का शोर हैं खुद को पाने की चाह में बेबस भटकती दर बदर फिर रही हूं  सच ...