नदियों सी बहती है कभी झील सी ठहरी है कभी सीधी कभी टेडी सी है जिंदगी
उलझकर रह जाता कोई इस जिंदगी नाम की किताब में कोई सुलझाकर इसे ही उलझा दे पन्ने होते है कुछ ऐसे जो खुद ये भी ना समझ पाए पर दूसरो को देखो कैसे उलझाए
समझ न आए जब खेल जिंदगी का तो जहमत ना उठाए मांझी में अपने झाक कर देख लेना कुछ गलत था ये खुद समझ आ जायेगा
उलझी हुई डोर को सुलझाने में मशगूल हुए बैठकर ना जाने कब जिंदगी इतनी मशगूल हो गई की अब बेवफा हो गई ना हम जानते ये क्या चाहती है और वो जानती की हम क्या चाहते है
सीख गए है हाल दिल का लिखना बस लिख देते है जानने को दिल बेताब है ये बस किस्से है या बस कुछ वक्त के लिए की गई दिल्लगी
पहले कहानी जिंदगी की हम बैठकर सुनाया करते थे महफिलों में अब जिंदगी कहानी सुनाती है और हम बस श्रोता बन रह गए
रूठकर बैठना हमने कभी सीखा ही नही तूने ना जाने किस बेगरत की पनाह में ये सिख लिया साथ चलते थे हम तो फिर क्यों अब यू मुंह मोड़ लिया
नए चेहरे भी आए अब आंखों के परदे पर लेकिन तेरे दीदार के बिना मायूस है वो हसीन आजकल
बस कुछ लम्हे ही तो खफा रहते थे उन दिनो फिर आज क्यों इतनी नाराजगी है बता भी दे अब
सांझ को आसमान के नीचे का आलम भी कुछ यू सवाल करता है अब अकेले क्यों हो तुम तू कोई जवाब बता भी दे
रात को आंखों से खफा नींद आने का नाम नहीं लेती बेहया ना जाने किन नैनों का सुकून बन गई पर खुशी तो है थोड़ी कोई सुकून में तो है
ना बदल तू रास्ते इस कदर मंजिल तो हमारी एक है क्यों रास्तों में खोना इधर उधर पथरीले रास्तों पर हम ही तो तेरे कदमों में हाथ बिछाएंगे
किस बात का गुरुर है ए जिंदगी तुझे हम अपने हौसलों का तीर बनायेगे जो मंजिल है हमारे तुझे वही पहुंचाएंगे
वक्त का तकाजा होने तक की बात है फिर तुझे अपनी हाथो की सुनहरी लकीरें बनायेगे