Innocent love

Saturday, August 28, 2021

ढूंढू कहां

ढूंढू कहा खुद को खुद में ही बेचैन हूं
ना आज का पता न कल का बस ख्वाइशों का शोर हैं
खुद को पाने की चाह में बेबस भटकती दर बदर फिर रही हूं 
सच और झूठ में कोई फासला तय दिखता नही 
कभी इस डाल तो कभी उस डाल बेसुध सी मर रही हूं
मझधार में फंसी नैया ना इस पार न उस पार 
कसमकश से जूझती आखों से नींद कई दिनों से नाराज़.....
       खुद को ढूंढू कहा**

मन को उदाशी ने जकड़ा है कहूं किस्से ना कोई अपना है
सपने बदलते है रोज आखों के आयनों पर कोई तो हो अपना पर सब लगता बेकार है..   
       खुद को ढूंढू कहा**

किसी सायर की सायरी में तलाशती हूं कभी
किसी कवि की कविता में मिल जाए कुछ मेरे जैसा बार बार पढ़ डालती हूं
सवाल कभी अश्को से करती वजह क्या तेरे आने की 
बिन बताए वो गिर जाता बारी है दूसरे के आने की
आंधियारो में कैद हु या उजाले बस नाम के है 
खुद अंधियारा हूं या अंदर चली कोई आंधी है............
       खुद को ढूंढू कहा**

कोई किताब होती तो पन्ना पलटकर समझ लेती 
पर था तो मांझी में अटकी पतवार है
उदासी भी देखकर मुझको आज उदास है ना नैनो में अश्क है ना दिल में करार है 
सुख गई आंखे छानते छानते भीतर से आती जल की धार
को  
करू क्या ऐसा जो मन का उजाला रोशन करे मेरे अटके हुए संसार को 
रूठकर खुद से ही बैठी हूं कोई आस नजर आए तो खुश हो जाऊ पर वीरान है राह मुझ तक आने की कोई आए भी तो कैसे................
        खुद को ढूंढू कहा**

कोशिश बहुत की दिल लगाने की पर जानता है ये जालिम कही और लग गया तो भूल न जाऊ उस दिल की लगी को 
आसमान के तारे गिनते गिनते भर आते है सुंदर स्वप्न
जुड़ जाति है कोई आस की माला फिर टूट कर बिखर जाने के लिए
मन का रूदन कम न होता सुनकर किसी गजलकार की गजल बड़ जाती है करुणा खुद से खुद को देने की
बिलख रही हूं रो रही हूं तड़प रही हूं बस एक टेर लगी हैं जो जीने की चाहत हैं उसे पाने की
सिकुड़ी एक कोने में निशा का अंधकार थम जाता है ताकते ताकते लालिमा को दिवाकर की भोर फिर खिल जाती है
बेबस हूं फिर भी किसी मन के कोने में कोई उजियारा तो मिल जाए...................
        खुद को ढूंढू कहा**

वो कवि तो कहता है मिल जाते है रास्ते झाक कर देख अपने भीतर एक बार  
क्यों पथरीले है ये रास्ते कहा तक चलू ना कोई मंजिल है ना कोई हमराही है ना छाव मिलने की उम्मीद नजर आती है ना ना कोई हरी घास का सुकून बस अनंत रास्ते है बस चलते जाना चलते जाना बस चलते जाना
पिघल जाता है लावा भी एक तू ही ना पिघला कहने भर है क्या तू भगवान, तेरे समक्ष रोशन लौ कभी भुजने ना दी फिर तू क्यों जला रहा मुझे इस मोह की माया नगरी में 
दिला दे यकीन या तो मुझे खुद पर या तो छुड़ा दे ये अरमानों की जंजीर.....................
         खुद को ढूंढु कहा**

लिखती रहती हूं कुछ कुछ छुपाने को खुद से बहुत कुछ 
मार्मिक रचना कह देते है स्रोता पढ़कर मेरे खो जाने का हाल सुनकर
खोई रही खुद में या पा ली खुद को ये एहसास आता है देखकर उस गमगीन इंसान को जो उलझा है कई हिसाबो में 
शांत रहूं तो समंदर सी गहरी हूं और अंतर का हाल लिखूं तो नदियों सी कल कल बहती हूं 
नदियां बन राह बनाकर बढ़ती कैसे जाऊ पथ पर अपने बुराइयों का ढेर मुझमें आपार है ठहरू कैसे समंदर सी गहराई का ना आभास है
गूंज रहा शहर लाखो खानकारो से मेरे कानो में तो खुद को खोजू कैसे शब्दो में लिपटे पल्लव स्वर की झनकार है 
रात सैन सैन ढल रही है रजनी का सौन्दर्य चढ़ता अपने चरम पर भोर का ये यलगार है
थक जाऊ सफर में किसी मेरे मन की आभा का सफर अविराम है.....................
             खुद को ढूंढू कहा**

रेखाएं हाथो की धुंधली धुंधली होती जाती है ना संघर्ष कोई न युद्ध कोई न तकलीफ कोई ,किसे आधार मानकर ये लकीर मिटती जाती है 
शकून अपशकुन का जांशा देकर झोंक रही क्यों भरम ज्वाला में 
चल चल चल चल चल ए जिन्दगी तेरा चलना भी रास आएगा तेरा रुकना भी रास आएगा तेरा दिल लगाना भी रास आएगा तेरा दिल तोड़ना भी रास आएगा तेरा दर्द भी रास आएगा तेरा दिया गम न मुझे सताएगा तेरे दिए पथरीले रास्ते भी रास आयेगे तेरी दी मखमल की जमीं भी रास आएगी ,ठहर न जाना कभी तेरे ठहर जाने से कयामत आएगी खुद खुदा की देह रह जायेगी बेजान..............
          खुद को ढूंढू कहा**

करवट ले रही कभी इस ओर तो कभी उस ओर पर नींद सुबह होने से बेखौफ है
अनगिनत कामों में उलझे सुबह से शाम तक के बारह घंटे किसी उधेड़ बुन में बीत गये
पहर गुजरते जा रहे है साए बढ़ते जा रहे है परछाईया रुख मोड़ रही है किंतु ना कोई जवाब मिला ना कोई जवाब मिला ना सुकून आज रात ढूंढते ढूंढते खुद को बिना नींद ही गुजरती जा रही है आखों ने नींद से सौदा कोई किया हो जाए ना पलके भारी है ना नींद का नामोनिशान है 
लिख रही हूं नींद कल दिन के उजियारे में फिर ढूंढेंगे खुद को आज उंनिदा ना रहने दे.................
        खुद को ढूंढू कहां**

Monday, August 23, 2021

मेरी डायरी, मेरी किट्टू

मेरी डायरी मेरे किस्से मेरी कहानी मेरे हिस्से खुशी के लम्हे गम के साए समेटे है हर जज्बात को खुद में कुछ शब्दों में बंधी श्याम और सुबह। ये स्याही है गवाह हर जज्बात की हर हालात की हर लम्हात  

मेरी डायरी साल गुजर गई इसमें नया साल भी देखा है चमचमाते वो नए साल के गली और मोहल्ले की तस्वीर भी है और इल्म भी

मकर सक्रांति का चूरमा और जाड़े की रात, खुले आसमान में उड़ती पतंग अपनी डोर के साथ,
लेकर रंगो की बहार होली के स्वागत में तैयार ढेरो गुलाल के रंग और मनोल्लास ,पन्नो में समेट कर डायरी ने रखा अपने पास

सावन आया चादर हरियाली की ओढ़कर जन्नत सा नजारा है, वादिया चहकती है तीज आने की बाट जोहती है
झूलो पर झूलता सावन मुस्कुराहट को देख नवयुवतियों की गदगद हो जाता है , घेवर की मिठास जब जी में घुल घुल जाती है साल भर उसकी याद आती है, 

कच्चे धागे से बनी राखी पक्के रिस्तो की डोर बन जाती है राखी आती है खुद को बया करने फिर सुंदर थाली में सज जाती है , भाई बहन की बरस भर की नटखट आंख मिचौली आज प्यार बन बरस जाती है, भाई वचन रक्षा का देता है बहन वचन खुशियां बटाने का देती है ,कलाई पर एक कच्ची डोर, आसमान में उड़ती पतंग और डोर 
मुश्किल सा है बांध पाना लफ्जो में 

सावन बीता सर्द हवाओं ने रूख अपना लिया देवी के नौ रातों ने भक्ति की परिभाषा समझाई,रामजी ने दशहरे को रावण की लंका जलाई। मेला दशहरे का देखने जब भी जाते गोलगप्पे और चाट के चटकारे जबान पर जरूर आते।
बड़े बुजुर्ग कह गए माया मरी न मन मरा मर मर गए शरीर , आसा तृष्णा न मरी ,कह गए दास कबीर। एक रावण जलाकर आए एक रावण मन में वापस ले आए 

घर की साज सज्जा का खयाल करते करते अपनी डायरी भूल गई तो पूछ लिया उसने ऐसा क्या खास है अरे यार दिलो की दिपावली है ढेर सारे पटाखे है कपड़ो की भरमार है फिर भी कौनसा पहने इसके लिए परेशान है
चमचम करती लडिया घर का श्रृंगार है आंगन की वो रंगो वाली रंगोली और दियो से सजा पूरा घर परिवार है
न्यारी न्यारी मिठाई देख कौनसी पहले खाऊं मन परेशान है
खुशियों को तस्वीर बनाने के लिए भाई का कमरा तैयार है
लक्ष्मी जी की आरती में बैठे बैठे पटाखे चलाने की होड़ है 
आसमान को छूकर कई रंगो में बिखरता रॉकेट का उजाला 
जैसे जिंदगी का भर गया हो खुशियां का प्याला  

गोवर्धन की कहानी और कृष्ण जी की मै दीवानी 
दाल बाटी चूरमा और गोवर्धन महाराज की जय जयकार से गूंजते हुए उस रात का ढल जाना ।
भाई दूज की वो मोली की डोर, लेकर आई अंधियारे से नई भोर 
बीत गया बरस चंद पन्नो पर बिखरी स्याही में सिमट गए सब अल्फाजों के ताल मेल में 
गुजर जाते है जो किस्से बन जाते कुछ कहानी बन जाते हैं किस्से और कहानी जिंदगी के हिस्से बन जाते है 
आज याद आई कुछ भूले बिसरे किस्सों की कुछ लफ्जो में लिपटे हिस्सो की तो डायरी ने सब दिखा दिया फिर बीते हुए वक्त को याद कर कभी मुस्कुराहट तो कभी आंखों को नम बना दिया 
       मेरी डायरी मेरी किट्टू

Saturday, August 14, 2021

आजादी

आजाद हु मै अगर रात होने का कोई डर ना हो 
आजाद हु मै अगर मनचाहे लिबाज में बाहर जाऊ
आजाद हु मै अगर मेरे अपने फैसले पर कोई टोके ना
आजाद हु मै अगर बिना घबराए बेझिझक बोल पाऊं
आजाद हु मै अगर किसी के पीछे भी साथ चल पाऊं
आजाद हु मै अगर चार लोगो में बोलने की इजाजत हो
आजाद हु मै अगर कोई मेरे विचारो पर सवाल ना उठाए
मै कितनी आजाद हु ये मै नहीं जानती 
आजादी के साल बहुत बीत गए मगर मन की आजादी अभी भी बंदिसो में बंधी है
कुछ हमने खुद को आजाद किया और कुछ  आजादी के दीवानों ने
 अपनी आजादी आज मनायेगे तो कल सुंदर बनेगा और अगर आज हम बस नाम की आजादी पर बोलेंगे तो कल बंध जायेगा           happy independence Day 

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ढूंढू कहां

ढूंढू कहा खुद को खुद में ही बेचैन हूं ना आज का पता न कल का बस ख्वाइशों का शोर हैं खुद को पाने की चाह में बेबस भटकती दर बदर फिर रही हूं  सच ...