ना आज का पता न कल का बस ख्वाइशों का शोर हैं
खुद को पाने की चाह में बेबस भटकती दर बदर फिर रही हूं
सच और झूठ में कोई फासला तय दिखता नही
कभी इस डाल तो कभी उस डाल बेसुध सी मर रही हूं
मझधार में फंसी नैया ना इस पार न उस पार
कसमकश से जूझती आखों से नींद कई दिनों से नाराज़.....
खुद को ढूंढू कहा**
मन को उदाशी ने जकड़ा है कहूं किस्से ना कोई अपना है
सपने बदलते है रोज आखों के आयनों पर कोई तो हो अपना पर सब लगता बेकार है..
खुद को ढूंढू कहा**
किसी सायर की सायरी में तलाशती हूं कभी
किसी कवि की कविता में मिल जाए कुछ मेरे जैसा बार बार पढ़ डालती हूं
सवाल कभी अश्को से करती वजह क्या तेरे आने की
बिन बताए वो गिर जाता बारी है दूसरे के आने की
आंधियारो में कैद हु या उजाले बस नाम के है
खुद अंधियारा हूं या अंदर चली कोई आंधी है............
खुद को ढूंढू कहा**
कोई किताब होती तो पन्ना पलटकर समझ लेती
पर था तो मांझी में अटकी पतवार है
उदासी भी देखकर मुझको आज उदास है ना नैनो में अश्क है ना दिल में करार है
सुख गई आंखे छानते छानते भीतर से आती जल की धार
को
करू क्या ऐसा जो मन का उजाला रोशन करे मेरे अटके हुए संसार को
रूठकर खुद से ही बैठी हूं कोई आस नजर आए तो खुश हो जाऊ पर वीरान है राह मुझ तक आने की कोई आए भी तो कैसे................
खुद को ढूंढू कहा**
कोशिश बहुत की दिल लगाने की पर जानता है ये जालिम कही और लग गया तो भूल न जाऊ उस दिल की लगी को
आसमान के तारे गिनते गिनते भर आते है सुंदर स्वप्न
जुड़ जाति है कोई आस की माला फिर टूट कर बिखर जाने के लिए
मन का रूदन कम न होता सुनकर किसी गजलकार की गजल बड़ जाती है करुणा खुद से खुद को देने की
बिलख रही हूं रो रही हूं तड़प रही हूं बस एक टेर लगी हैं जो जीने की चाहत हैं उसे पाने की
सिकुड़ी एक कोने में निशा का अंधकार थम जाता है ताकते ताकते लालिमा को दिवाकर की भोर फिर खिल जाती है
बेबस हूं फिर भी किसी मन के कोने में कोई उजियारा तो मिल जाए...................
खुद को ढूंढू कहा**
वो कवि तो कहता है मिल जाते है रास्ते झाक कर देख अपने भीतर एक बार
क्यों पथरीले है ये रास्ते कहा तक चलू ना कोई मंजिल है ना कोई हमराही है ना छाव मिलने की उम्मीद नजर आती है ना ना कोई हरी घास का सुकून बस अनंत रास्ते है बस चलते जाना चलते जाना बस चलते जाना
पिघल जाता है लावा भी एक तू ही ना पिघला कहने भर है क्या तू भगवान, तेरे समक्ष रोशन लौ कभी भुजने ना दी फिर तू क्यों जला रहा मुझे इस मोह की माया नगरी में
दिला दे यकीन या तो मुझे खुद पर या तो छुड़ा दे ये अरमानों की जंजीर.....................
खुद को ढूंढु कहा**
लिखती रहती हूं कुछ कुछ छुपाने को खुद से बहुत कुछ
मार्मिक रचना कह देते है स्रोता पढ़कर मेरे खो जाने का हाल सुनकर
खोई रही खुद में या पा ली खुद को ये एहसास आता है देखकर उस गमगीन इंसान को जो उलझा है कई हिसाबो में
शांत रहूं तो समंदर सी गहरी हूं और अंतर का हाल लिखूं तो नदियों सी कल कल बहती हूं
नदियां बन राह बनाकर बढ़ती कैसे जाऊ पथ पर अपने बुराइयों का ढेर मुझमें आपार है ठहरू कैसे समंदर सी गहराई का ना आभास है
गूंज रहा शहर लाखो खानकारो से मेरे कानो में तो खुद को खोजू कैसे शब्दो में लिपटे पल्लव स्वर की झनकार है
रात सैन सैन ढल रही है रजनी का सौन्दर्य चढ़ता अपने चरम पर भोर का ये यलगार है
थक जाऊ सफर में किसी मेरे मन की आभा का सफर अविराम है.....................
खुद को ढूंढू कहा**
रेखाएं हाथो की धुंधली धुंधली होती जाती है ना संघर्ष कोई न युद्ध कोई न तकलीफ कोई ,किसे आधार मानकर ये लकीर मिटती जाती है
शकून अपशकुन का जांशा देकर झोंक रही क्यों भरम ज्वाला में
चल चल चल चल चल ए जिन्दगी तेरा चलना भी रास आएगा तेरा रुकना भी रास आएगा तेरा दिल लगाना भी रास आएगा तेरा दिल तोड़ना भी रास आएगा तेरा दर्द भी रास आएगा तेरा दिया गम न मुझे सताएगा तेरे दिए पथरीले रास्ते भी रास आयेगे तेरी दी मखमल की जमीं भी रास आएगी ,ठहर न जाना कभी तेरे ठहर जाने से कयामत आएगी खुद खुदा की देह रह जायेगी बेजान..............
खुद को ढूंढू कहा**
करवट ले रही कभी इस ओर तो कभी उस ओर पर नींद सुबह होने से बेखौफ है
अनगिनत कामों में उलझे सुबह से शाम तक के बारह घंटे किसी उधेड़ बुन में बीत गये
पहर गुजरते जा रहे है साए बढ़ते जा रहे है परछाईया रुख मोड़ रही है किंतु ना कोई जवाब मिला ना कोई जवाब मिला ना सुकून आज रात ढूंढते ढूंढते खुद को बिना नींद ही गुजरती जा रही है आखों ने नींद से सौदा कोई किया हो जाए ना पलके भारी है ना नींद का नामोनिशान है
लिख रही हूं नींद कल दिन के उजियारे में फिर ढूंढेंगे खुद को आज उंनिदा ना रहने दे.................
खुद को ढूंढू कहां**
No comments:
Post a Comment