बता मेरे रांझणा .......
प्यार में तेरे जी लू या मर जाऊ
बता दे तू ही, तेरी आंखों में बस जाऊ या खुद को बह जाने दू
बता दे मेरे रांझणा......
आगोश में तेरे डूब जाऊ या तर जाने दू,
आतिश मोहब्बत है तेरी अफ़सुर्दा हूं अनजान हू अंजाम से
अश्क बनेगा मेरे या अशफाक बता दे रांझणा ..........
तू आरजू है मेरी इकि्तजा है मेरी इत्माम बन मेरा मैं तुझमें सिमट जाऊ,
आगाज़ है ये अफसाने का या अन्त ज़रा इजाज-सा है;
इश्क है या अगलात बता दें मेरे रांझणा......
आब-ए-आइने में नज़र आते हो तुम इस कदर जैसे झील में आफ़ताब कि पहली किरण,
मोहब्बत का इज़हार करूं या इजि्तरार;
इबादत करु तुम्हे पाने कि या भूल जाऊं बता मेरे रांझणा......
अब तो ये आलम तुझे ही पुकारु मैं सुबह शाम,कोई अल्फाज़ ना हो तेरी खामियों के लिए
बेघर पंक्षी का बन जा तू आशियाना
मान लूं तुझे अपना ख़ुदा या दुआओ मे छोड़ दूं बता दें मेरे रांझणा......
समेट ले खुद में इस कदर अब्र में पानी की बूंदें हो जैसे ,
तेरी इबि्तसाम हूं मैं या उदासी हूं बता दें मेरे रांझणा........
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